मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े युद्ध का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। सबसे ज्यादा दबाव भारतीय रुपये, कच्चे तेल और आयात लागत पर पड़ा है। बीते करीब 80 दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 5.67 फीसदी कमजोर हुआ है। 27 फरवरी को जहां 1 डॉलर की कीमत 91.08 रुपये थी, वहीं 18 मई तक यह बढ़कर 96.25 रुपये तक पहुंच गई। रुपये की इस गिरावट का असर आम लोगों से लेकर छात्रों, निवेशकों और कारोबार तक हर क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है।

विदेश में पढ़ाई हुई महंगी, फीस में बढ़ा लाखों का बोझ

रुपये की कमजोरी का सबसे बड़ा असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी छात्र की सालाना फीस 50 हजार अमेरिकी डॉलर है, तो फरवरी में यह फीस करीब 45.50 लाख रुपये बैठती थी। लेकिन अब डॉलर 96 रुपये के करीब पहुंचने से वही फीस करीब 48 लाख रुपये हो गई है। यानी सिर्फ रुपये की गिरावट की वजह से करीब 3 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।

फीस का गणित:

50,000 × 91 = 45,50,000 रुपये

50,000 × 96 = 48,00,000 रुपये

पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतों पर बढ़ सकता है असर

ईरान युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर भारत के ईंधन बाजार पर पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए रुपये की कमजोरी से तेल खरीदना और महंगा हो जाता है। अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और पीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसके अलावा एयरलाइंस कंपनियों की लागत भी बढ़ रही है, जिससे हवाई यात्रा महंगी होने का खतरा पैदा हो गया है।

शेयर बाजार में दबाव, सोने में दिख सकती है तेजी

वैश्विक तनाव के माहौल में विदेशी निवेशक अक्सर सुरक्षित निवेश की ओर रुख करते हैं। ऐसे में भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेश निकलने का खतरा बढ़ जाता है। इसका असर सेंसेक्स और निफ्टी पर देखने को मिल सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक बैंकिंग, ऑटो, एविएशन और पेंट सेक्टर के शेयरों पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं दूसरी ओर सोना और चांदी जैसी सुरक्षित निवेश वाली संपत्तियों में तेजी देखने को मिल सकती है, क्योंकि अनिश्चितता के दौर में निवेशक सोने को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं।

महंगाई बढ़ने का खतरा, आम आदमी की जेब पर असर

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहता। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाने-पीने और रोजमर्रा के सामान की लागत भी बढ़ जाती है। एफएमसीजी कंपनियों की लागत बढ़ने से बाजार में जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।

अगर रुपया और कमजोर होता है तो तेल कंपनियां कीमतों में और इजाफा कर सकती हैं। ऐसे में महंगाई बढ़ने का खतरा और गहरा सकता है। रुपये की गिरावट को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को भी हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। किसी भी देश की मुद्रा में गिरावट का असर उसकी पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और फिलहाल भारत भी इसी चुनौती का सामना कर रहा है।

 

 

 

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