पटना : 21वीं सदी में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। इस बदलते भू-राजनीतिक वातावरण में एशिया का महत्व निरंतर बढ़ रहा है और इसी परिप्रेक्ष्य में भारत तथा मलेशिया के बीच संबंध नई मजबूती और व्यापकता प्राप्त कर रहे हैं। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मलेशिया यात्रा ने दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने का कार्य किया है। यह यात्रा केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन, आर्थिक सहयोग, तकनीकी साझेदारी और सुरक्षा रणनीति के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत और मलेशिया के संबंध ऐतिहासिक रूप से अत्यंत प्राचीन और गहरे रहे हैं। इतिहासकारों के अनुसार, चोल साम्राज्य के समय से ही दोनों क्षेत्रों के बीच समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता रहा है। भारतीय संस्कृति, भाषा और धार्मिक परंपराओं का प्रभाव आज भी मलेशिया के सामाजिक जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। स्वतंत्रता के बाद इन संबंधों को औपचारिक कूटनीतिक आधार मिला और समय के साथ यह साझेदारी और अधिक मजबूत होती गई। भारत की “लुक ईस्ट नीति” और बाद में विकसित “एक्ट ईस्ट नीति” ने दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान की, जिसमें मलेशिया एक महत्वपूर्ण साझेदार बनकर उभरा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी सक्रियता बढ़ाई है। उनकी विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना, आर्थिक विकास को गति देना और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना रहा है। मोदी सरकार की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू लोकतंत्र, जनसांख्यिकीय शक्ति, मांग आधारित अर्थव्यवस्था और निर्णायक नेतृत्व पर आधारित रणनीति रही है। इसी रणनीतिक सोच के तहत भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी भूमिका को मजबूत किया है और समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दी है।

मलेशिया का भौगोलिक स्थान भारत की इस रणनीति में विशेष महत्व रखता है। यह देश मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जो विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। इस मार्ग से होकर विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसलिए मलेशिया के साथ मजबूत संबंध भारत को न केवल व्यापारिक लाभ प्रदान करते हैं, बल्कि समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन स्थापित करने में भी मदद करते हैं। विशेष रूप से चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत और मलेशिया का सहयोग महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हालिया द्विपक्षीय वार्ताओं के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने कई महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति व्यक्त की। इन समझौतों में सेमीकंडक्टर उद्योग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रक्षा सहयोग, ऊर्जा, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र शामिल हैं। विशेष रूप से तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में दोनों देशों ने संयुक्त अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। यह सहयोग दोनों देशों को वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में मजबूत बनाएगा।

ऊर्जा क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। अक्षय ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं की योजना बनाई गई है। भारत और मलेशिया दोनों ही जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना चाहते हैं। इस दिशा में दोनों देशों के बीच तकनीकी और निवेश सहयोग क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा।

वित्तीय सहयोग भी द्विपक्षीय संबंधों का महत्वपूर्ण पहलू बनकर उभरा है। भारत के भारतीय रिजर्व बैंक और मलेशिया के केंद्रीय बैंक के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने पर सहमति बनी है। भारतीय रुपया और मलेशियाई रिंगिट के माध्यम से व्यापार करने की पहल वैश्विक व्यापार में डॉलर पर निर्भरता को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह पहल दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को स्थिर और संतुलित बनाने में सहायक होगी।

द्विपक्षीय सहयोग का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू श्रमिकों और प्रवासी भारतीयों से जुड़ा हुआ है। मलेशिया में लगभग तीस लाख भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं, जिनमें अधिकांश तमिल मूल के हैं। यह समुदाय शिक्षा, व्यापार, राजनीति और सांस्कृतिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रवासी समुदाय को दोनों देशों के बीच संबंधों की मजबूत कड़ी बताया। प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए दोनों देशों के बीच सामाजिक सुरक्षा समझौते की दिशा में भी पहल की गई है।

सांस्कृतिक सहयोग को भी द्विपक्षीय संबंधों में विशेष स्थान दिया गया है। तमिल भाषा और संस्कृति के अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ मलाया में तिरुवल्लुवर अध्ययन केंद्र की स्थापना का स्वागत किया गया है। यह पहल सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूत करेगी और दोनों देशों के लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव को और गहरा बनाएगी।

हालांकि दोनों देशों के संबंध मजबूत हो रहे हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। व्यापारिक असंतुलन इनमें प्रमुख है। भारत मलेशिया से पाम ऑयल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उत्पादों का बड़े पैमाने पर आयात करता है, जबकि भारत का निर्यात अपेक्षाकृत कम है। इसके अतिरिक्त, पाम ऑयल पर भारत की निर्भरता कभी-कभी कूटनीतिक दबाव का कारण भी बनती रही है। इसलिए दोनों देशों को व्यापार संतुलन स्थापित करने के लिए नए अवसरों की तलाश करनी होगी।

भू-राजनीतिक स्तर पर भी कुछ मतभेद देखे गए हैं। मलेशिया ने अतीत में कश्मीर मुद्दे पर भारत की आलोचना की थी। इसके अलावा चीन के बेल्ट एंड रोड पहल के तहत मलेशिया में किए गए निवेश ने क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित किया है। फिर भी, हाल के वर्षों में दोनों देशों ने आपसी मतभेदों को संवाद और सहयोग के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया है।

वैश्विक मंच पर भी भारत और मलेशिया एक-दूसरे का समर्थन कर रहे हैं। मलेशिया ने भारत की ब्रिक्स में नेतृत्व भूमिका का समर्थन किया है, जबकि भारत ने मलेशिया की इस संगठन में सहयोगी देश के रूप में भागीदारी और संभावित सदस्यता की आकांक्षा का स्वागत किया है। इसी प्रकार दोनों देशों ने आसियान की एकता और केंद्रीयता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भी भारत और मलेशिया के बीच सहयोग बढ़ा है। मलेशिया ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। यह समर्थन भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा और कूटनीतिक प्रभाव को मजबूत करता है। इसके साथ ही मलेशिया ने वैश्विक व्यापार और आर्थिक विकास के क्षेत्र में भारत की तेजी से बढ़ती भूमिका की भी सराहना की है।

आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग भी दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण पहलू बनकर उभरा है। भारत लंबे समय से आतंकवाद को वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है। इस विषय पर दोनों देशों ने खुफिया जानकारी साझा करने, सुरक्षा प्रशिक्षण और संयुक्त रणनीति विकसित करने पर सहमति व्यक्त की है। यह सहयोग क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में सहायक होगा।

भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए भारत और मलेशिया के संबंधों में व्यापक विस्तार की संभावना है। डिजिटल तकनीक, स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र, रक्षा उत्पादन, समुद्री सुरक्षा और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों को आर्थिक और रणनीतिक रूप से मजबूत बनाएगा। साथ ही, क्षेत्रीय व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने में भी यह साझेदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

समग्र रूप से देखा जाए तो भारत और मलेशिया के संबंध केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह साझेदारी एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन और स्थिरता स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। हालिया कूटनीतिक पहल और समझौते इस बात का संकेत देते हैं कि दोनों देश भविष्य में भी सहयोग और साझेदारी के नए आयाम स्थापित करेंगे। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत और मलेशिया का यह सहयोग क्षेत्रीय शांति, आर्थिक विकास और रणनीतिक संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।