पटना : नीतीश कुमार का इस तरह अचानक खामोशी से बिहार का सीएम पद छोड़कर राज्यसभा में जाना किसी को पच नहीं रहा है। आम तौर पर ये नौबत तब आती है जब पार्टी में किसी नेता के खिलाफ असंतोष हो और नेता को लगे कि वो विधानसभा में अपना बहुमत नहीं साबित कर पाएगा। नीतीश कुमार ने राज्यसभा में जाने के लिए नामांकन भर दिया है। उनके साथ जद(यू) के रामनाथ ठाकुर, भाजपा के नितिन नवीन व शिवेश कुमार तथा राष्ट्रीय लोक मोर्च के उपेंद्र कुशवाहा ने भी नामांकन किया है। स्वयं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पटना में इस मौके के गवाह बने।

लगभग दो दशकों तक राज्य की सत्ता के केंद्र में रहने वाले नीतीश कुमार का यह कदम कई सवाल खड़े कर रहा है। आमतौर पर किसी मुख्यमंत्री के पद छोड़ने की स्थिति तब बनती है जब पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ जाए या नेता को लगे कि वह विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे। लेकिन नीतीश कुमार के मामले में ऐसी कोई स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई है, इसलिए उनका यह फैसला राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

नामांकन के बाद एनडीए नेताओं के साथ सरकार के नए गठन को लेकर बैठक की चर्चा भी सामने आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक नेता के संसद जाने की खबर नहीं है, बल्कि बिहार की लगभग 20 साल पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के अंत और नए सत्ता समीकरण की शुरुआत का संकेत भी हो सकता है।

चुनाव में जीत के चार महीने बाद ही बड़ा फैसला

75 वर्षीय नीतीश कुमार ने नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उस चुनाव में एनडीए को बड़ी जीत मिली थी। BJP 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि JDU को 85 सीटें मिलीं।

हालांकि सीटों के लिहाज से भाजपा आगे रही, लेकिन चुनावी जीत का श्रेय काफी हद तक नीतीश कुमार की लोकप्रियता को दिया गया था। ऐसे में महज चार महीने बाद उनका मुख्यमंत्री पद छोड़ने का फैसला लोगों को चौंका रहा है।

जेडीयू नेता इसे नीतीश कुमार का व्यक्तिगत निर्णय बता रहे हैं, जबकि विपक्ष का आरोप है कि भाजपा धीरे-धीरे अपने सहयोगी दलों को कमजोर कर देती है और यह फैसला उसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

क्या बेटे निशांत कुमार के लिए बनाई जा रही है राह?

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा के साथ ही उनके बेटे निशांत कुमार को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर नीतीश कुमार राज्य में नई नेतृत्व व्यवस्था के लिए रास्ता बना सकते हैं। कुछ चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, जिससे उनकी राजनीतिक पारी की शुरुआत हो सकती है।

CM पद छोड़ने के बदले उन्हें क्या मिल सकता है?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने से नीतीश कुमार को क्या हासिल होगा। भारतीय राजनीति में अक्सर देखा गया है कि नेता आखिरी समय तक सत्ता छोड़ने से बचते हैं।

ऐसे कई उदाहरण हैं जब नेताओं ने स्वास्थ्य खराब होने या जेल में रहने के बावजूद पद नहीं छोड़ा। लेकिन नीतीश कुमार की स्थिति अलग दिख रही है। उनके पास अभी भी कुछ साल सक्रिय राजनीति करने का अवसर था।

कुछ लोग मानते हैं कि उन्हें केंद्र में कोई भूमिका मिल सकती है, जैसे केंद्रीय मंत्री का पद। हालांकि राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है।

जेडीयू का भविष्य क्या होगा?

नीतीश कुमार के बिना जेडीयू का भविष्य भी बड़ा सवाल बन सकता है। पार्टी की पहचान काफी हद तक नीतीश कुमार की छवि पर टिकी रही है। उनके बाद पार्टी में ऐसा कोई नेता नजर नहीं आता जो लंबे समय तक नेतृत्व संभाल सके। ऐसे में जद(यू) के सामने दो विकल्प हो सकते हैं- या तो वह भाजपा के साथ और मजबूती से खड़ी रहे, या धीरे-धीरे उसके नेताओं का भाजपा में जाना शुरू हो जाए।

कुछ विश्लेषक तो यह भी मानते हैं कि भविष्य में जेडीयू का भाजपा में विलय भी संभव हो सकता है, हालांकि अभी यह केवल राजनीतिक संभावना भर है।

क्या यह फैसला दबाव में लिया गया?

नीतीश कुमार के इस फैसले को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या यह निर्णय किसी दबाव में लिया गया है। या यह पूरी तरह नीतीश कुमार की मर्जी से लिया गया फैसला है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि भाजपा लंबे समय से बिहार में अपने मुख्यमंत्री की तलाश में थी और अब परिस्थितियां उसके अनुकूल बन गई हैं।

अमित शाह की पटना यात्रा और नई सरकार के गठन को लेकर हो रही चर्चाओं को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। अगर ऐसा होता है तो बिहार की राजनीति में भाजपा पहली बार पूरी तरह नेतृत्व की भूमिका में आ सकती है।