मधुबनी में मिथिला कला का विश्व स्तर पर डंका, रामचरितमानस के 51 प्रमुख प्रसंगों को चित्रों और दोहों के जरिए किया गया जीवंत।

मधुबनी: बिहार के मधुबनी जिले ने मिथिला की पारंपरिक कला और संस्कृति के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। सौराठ स्थित मिथिला चित्रकला संस्थान में 160 कलाकारों ने मिलकर 108 मीटर लंबी रामचरितमानस आधारित विशाल मिथिला पेंटिंग तैयार की है। इस ऐतिहासिक कलाकृति को विश्व रिकॉर्ड में शामिल किया गया है।

इस विशाल पेंटिंग में रामचरितमानस की कथा के 51 प्रमुख प्रसंगों को पारंपरिक मिथिला चित्रकला शैली में उकेरा गया है। खास बात यह है कि प्रत्येक प्रसंग के चित्र के नीचे उससे संबंधित दोहे भी लिखे गए हैं। इस तरह पूरी कलाकृति को देखने पर रामचरितमानस की कथा चित्रों और दोहों के माध्यम से सहज रूप से समझी जा सकती है।

48 घंटे लगातार चला पेंटिंग बनाने का काम

108 मीटर लंबे विशेष पेपर कैनवास पर इस विशाल कलाकृति को तैयार करने के लिए 160 कलाकारों ने लगातार 48 घंटे तक काम किया। विशेष कैनवास को इंदौर से मंगाया गया था। कलाकारों ने पारंपरिक रंगों और ब्रश का इस्तेमाल करते हुए रामायण के विभिन्न प्रसंगों को मिथिला पेंटिंग की शैली में चित्रित किया।

इतने बड़े कैनवास पर रामचरितमानस की संपूर्ण कथा के प्रमुख प्रसंगों को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करना कलाकारों के लिए बड़ी चुनौती थी। लगातार 48 घंटे की मेहनत के बाद कलाकारों ने इस चुनौती को पूरा करते हुए मिथिला चित्रकला को विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाई।

पद्मश्री और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकारों का मार्गदर्शन

इस ऐतिहासिक पेंटिंग को मधुबनी के पद्मश्री, राष्ट्रीय पुरस्कार और राज्य पुरस्कार से सम्मानित कलाकारों की देखरेख और मार्गदर्शन में तैयार किया गया।

इस पूरी पहल में पद्मश्री शांति देवी, पद्मश्री दुलारी देवी, पद्मश्री शिवन पासवान और पद्मश्री बउआ देवी का मार्गदर्शन रहा। वहीं राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित डॉ. रानी झा, प्रतीक प्रभाकर और संजय जायसवाल ने भी कलाकारों को मार्गदर्शन दिया।

रामचरितमानस के 51 प्रसंगों की अद्भुत प्रस्तुति

108 मीटर लंबे कैनवास पर भगवान राम के जीवन और रामचरितमानस से जुड़े 51 प्रमुख प्रसंगों को मिथिला की पारंपरिक चित्रकला शैली में प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक चित्र में बारीकी से कथा को उकेरा गया है और उसके साथ संबंधित दोहे लिखे गए हैं।

इस वजह से यह पेंटिंग सिर्फ एक विशाल कलाकृति नहीं, बल्कि चित्रों के माध्यम से रामचरितमानस की कथा को समझाने वाला एक अनूठा दस्तावेज भी बन गई है।

भविष्य में म्यूजियम में रखी जाएगी पेंटिंग

इस ऐतिहासिक कलाकृति को सुरक्षित रखने की भी तैयारी की जा रही है। जिस विशेष पेपर कैनवास पर पेंटिंग तैयार की गई है, उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जा रही है। भविष्य में इस विशाल पेंटिंग को म्यूजियम में प्रदर्शित करने की योजना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी मिथिला की इस ऐतिहासिक उपलब्धि को देख और समझ सकें।

पेंटिंग तैयार होने के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने इसकी फोटो और वीडियोग्राफी की। भारत के अलावा विदेशों में भी इस ऐतिहासिक कलाकृति को लेकर लोगों में उत्सुकता देखी गई।

कलाकारों को ग्लोबल मार्केट से जोड़ने की पहल

इस आयोजन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि ‘मिथिला पेंटिंग-सह-ई-कॉमर्स पोर्टल’ की शुरुआत है। इस पोर्टल के जरिए मिथिला के कलाकारों और उनकी कला को सीधे देश-दुनिया के बाजार से जोड़ने की कोशिश की गई है।

अब कलाकार अपने मिथिला पेंटिंग से जुड़े उत्पादों और कलाकृतियों को ऑनलाइन माध्यम से देश के साथ-साथ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बेच सकेंगे। इससे स्थानीय कलाकारों को व्यापक बाजार मिलने के साथ उनकी आय और पहचान बढ़ने की उम्मीद है।

मिथिला कला को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान

यह पूरी पहल मधुबनी के जिलाधिकारी और कला एवं संस्कृति पदाधिकारी नीतीश कुमार के संरक्षण में पूरी की गई। अधिकारियों, वरिष्ठ कलाकारों और 160 कलाकारों के सामूहिक प्रयास से तैयार यह विशाल पेंटिंग मिथिला की समृद्ध कला परंपरा और भारतीय संस्कृति के अनूठे संगम का उदाहरण बन गई है

108 मीटर लंबी रामचरितमानस की यह मिथिला पेंटिंग अब मधुबनी ही नहीं, बल्कि बिहार की कला और संस्कृति की वैश्विक पहचान का प्रतीक बन गई है।