नई दिल्ली: राघव चड्ढा समेत आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों के अलग होने के फैसले से सियासी हलचल बढ़ गई है। चड्ढा ने दावा किया कि राज्यसभा में पार्टी के दो-तिहाई सांसदों ने बीजेपी में विलय कर लिया है, इसलिए यह संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत दल-बदल नहीं माना जाएगा।
वहीं, सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने इस दावे को गलत बताते हुए कहा कि इस तरह का विलय कानूनी प्रावधानों के खिलाफ है।
सिब्बल का तर्क: सांसद अपने स्तर पर नहीं कर सकते मर्जर
सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि 1985 में लागू दलबदल कानून के तहत विलय का फैसला संगठन स्तर पर होना जरूरी है। उनके मुताबिक सिर्फ कुछ सांसद मिलकर मर्जर का फैसला नहीं ले सकते है। पहले राजनीतिक दल को औपचारिक प्रस्ताव पास करना होता है पार्टी की मंजूरी के बिना ऐसा विलय कानून के खिलाफ माना जाएगा।
क्या कहती है 10वीं अनुसूची?
संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के पैरा 4 में विलय का अपवाद दिया गया है:
* अगर “मूल राजनीतिक पार्टी” किसी दूसरी पार्टी में विलय कर जाए, तो सदस्यों पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा।
* पैरा 4(2) के अनुसार, कम से कम दो-तिहाई विधायी दल का समर्थन जरूरी है।
* असहमति रखने वाले सदस्य अलग समूह बनाकर काम कर सकते हैं।
अदालतों के फैसले और असली पेच
Subhash Desai vs State of Maharashtra (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि राजनीतिक पार्टी और विधायी दल एक नहीं हैं, और अलग-अलग भूमिका रखते हैं।
हालांकि, गोवा मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की अलग राय रही:
* 2019 में कांग्रेस के 10 विधायक BJP में शामिल हुए।
* 2022 में कोर्ट ने माना कि दो-तिहाई विधायकों की सहमति से विलय वैध हो सकता है, भले ही पार्टी की मंजूरी न हो।
* यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
इसी विरोधाभास के चलते सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या सिर्फ विधायी दल के आधार पर विलय वैध है या पार्टी की मंजूरी जरूरी? यही इस पूरे विवाद का असली पेच है।
