पटना : बिहार की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल होने जा रही है। दरभंगा स्थित मिथिला संस्कृत शोध संस्थान और ऑक्सफोर्ड संस्कृत टेक्स्ट सोसाइटी के बीच प्रस्तावित संस्थागत सहयोग (एमओयू) को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुशी जताई है। उन्होंने इसे बिहार के लिए ऐतिहासिक अवसर बताते हुए कहा कि इस पहल से मिथिला की प्राचीन ज्ञान परंपरा और दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्यसभा सांसद एवं जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय कुमार झा की पहल पर यह सहयोग प्रस्ताव सामने आया है। उन्होंने इस प्रयास के लिए संजय झा का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इससे मिथिला संस्कृत शोध संस्थान में सुरक्षित हजारों दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियों का वैज्ञानिक सूचीकरण, डिजिटलीकरण, संरक्षण, शोध और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त होगा।
उन्होंने कहा कि यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ को बिहार में नई गति देगी। इस मिशन का उद्देश्य देशभर में संरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, संरक्षण, डिजिटलीकरण और उन्हें वैश्विक शोध समुदाय के लिए उपलब्ध कराना है। ऐसे में ऑक्सफोर्ड संस्कृत टेक्स्ट सोसाइटी के साथ सहयोग बिहार को भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रख्यात संस्कृतविद् प्रोफेसर दिवाकर आचार्य द्वारा इस सहयोग का प्रस्ताव भेजा जाना बिहार के लिए गर्व का विषय है। विश्व के प्रतिष्ठित शोध संस्थानों के साथ कार्यरत ऑक्सफोर्ड संस्कृत टेक्स्ट सोसाइटी का मिथिला संस्कृत शोध संस्थान के साथ जुड़ना इसकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रमाण है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जनवरी 2025 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी प्रगति यात्रा के दौरान मिथिला संस्कृत शोध संस्थान के जीर्णोद्धार और आधुनिकीकरण की घोषणा की थी। इसके बाद फरवरी 2025 में राज्य मंत्रिमंडल ने संस्थान के भवन निर्माण, परिसर विकास और पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए लगभग 57 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी, जिस पर वर्तमान में कार्य जारी है।
मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि प्रस्तावित एमओयू को आवश्यक प्रशासनिक सहयोग मिलने के बाद मिथिला की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक पहचान मिलेगी और भारत की प्राचीन ज्ञान-संपदा के संरक्षण एवं प्रसार को नई दिशा प्राप्त होगी।
