पटना : भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने बिहार में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुरुवार को राज्य विधानसभा में पेश इस रिपोर्ट में लाभार्थियों के चयन, सत्यापन प्रक्रिया और जियो-टैगिंग व्यवस्था में चौंकाने वाली अनियमितताओं का खुलासा हुआ है।
नाबालिगों के नाम पर आवास स्वीकृत
रिपोर्ट के अनुसार, नमूना जिलों की जांच के दौरान ऐसे मामले सामने आए जिनमें अपात्र नाबालिगों के नाम पर पक्के मकान स्वीकृत कर दिए गए। जबकि योजना के प्रावधानों में स्पष्ट है कि सामान्य परिस्थितियों में नाबालिगों के नाम पर आवास पंजीकरण की अनुमति नहीं है। मालूम हो कि केंद्र सरकार ने सितंबर 2017 में यह जरूर स्पष्ट किया था कि यदि पति-पत्नी दोनों की मृत्यु हो जाए तो नाबालिग बच्चे के नाम पर अभिभावक की संयुक्त पुष्टि के बाद आवास स्वीकृत किया जा सकता है।
लेकिन ऑडिट में चार नाबालिग लाभार्थियों के मामले सामने आए इनमें से दो मामलों में माता-पिता जीवित थे, फिर भी आवास स्वीकृत कर दिया गया,
और इन अपात्र लाभार्थियों को 2.50 लाख रुपये का भुगतान भी कर दिया गया। यह सीधे तौर पर पात्रता सत्यापन प्रक्रिया की विफलता को दर्शाता है।
जियो-टैगिंग में भारी गड़बड़ी
CAG रिपोर्ट में जियो-टैगिंग प्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। 52 मामलों में घरों की लोकेशन वास्तविक स्थान से काफी दूर दर्ज की गई। 3 मामलों में घरों की जियो-टैगिंग राज्य से बाहर – दिल्ली, झारखंड में की गई। बता दें कि इन स्थानों की दूरी वास्तविक स्थल से 51 किलोमीटर से लेकर 915 किलोमीटर तक पाई गई। यह सवाल खड़ा करता है कि निगरानी और तकनीकी सत्यापन प्रणाली आखिर काम कैसे कर रही थी?
योजना का उद्देश्य और जमीनी हकीकत
प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण की शुरुआत जून 2015 में ग्रामीण गरीबों को कच्चे मकानों से मुक्ति दिलाकर पक्के घर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। योजना का मकसद था- गरीब परिवारों को सम्मानजनक आवास, स्वच्छ रसोई और बुनियादी सुविधाएं, पारदर्शी और तकनीक-आधारित निगरानी प्रणाली। लेकिन ताजा रिपोर्ट से साफ है कि कागजों पर पारदर्शिता और जमीन पर हकीकत में बड़ा अंतर दिखाई दे रही है।
सिस्टम की नाकामी पर सवाल
- क्या लाभार्थियों का सत्यापन केवल औपचारिकता बनकर रह गया है?
- क्या पैसे लेकर नाबालिगों को आवास दिया गया?
- जियो-टैगिंग जैसी तकनीकी व्यवस्था के बावजूद इतनी बड़ी त्रुटियां कैसे हुईं?
- क्या स्थानीय स्तर पर निगरानी और जवाबदेही की कमी है?
CAG की रिपोर्ट ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि प्रणालीगत खामियों और निगरानी की ढिलाई ने योजना की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि आवास के वितरण में जो घोटाला हुआ है सरकार इन अनियमितताओं पर क्या कार्रवाई करती है और भविष्य में ऐसी चूक रोकने के लिए कौन से सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।
