बैंकिंग उद्योग में परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) के नए फार्मूले को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। United Forum of Bank Unions ने आरोप लगाया है कि संशोधित PLI व्यवस्था को एकतरफा लागू किया जा रहा है, जिसके खिलाफ देशभर में कर्मचारियों और अधिकारियों का व्यापक और स्वतःस्फूर्त विरोध सामने आया है।
UFBU के महासचिव रूपम राय के अनुसार, शाखाओं से लेकर प्रशासनिक कार्यालयों तक कर्मचारियों ने एकजुटता के साथ आंदोलन में भाग लिया है। यह विरोध केवल प्रोत्साहन राशि का मुद्दा नहीं, बल्कि कार्यबल की एकता, निष्पक्षता और सामूहिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा हुआ है।
क्या है विवाद की जड़?
Department of Financial Services द्वारा प्रस्तावित नया PLI फार्मूला मौजूदा द्विपक्षीय समझौते से अलग बताया जा रहा है। जहां वर्तमान व्यवस्था बैंक के सामूहिक प्रदर्शन पर आधारित है, वहीं नया फार्मूला अधिकारियों के बीच वर्गीकरण और व्यक्तिगत मूल्यांकन पर जोर देता है।
UFBU का कहना है कि इससे:
* कर्मचारियों में असमानता बढ़ेगी।
* टीमवर्क कमजोर होगा।
* औद्योगिक संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
विशेष रूप से स्केल IV और उससे ऊपर के अधिकारियों को अलग करने के प्रयास को यूनियन ने “विभाजनकारी” बताया है।
सुलह प्रक्रिया के बीच बढ़ा तनाव
यह मामला पहले से ही मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय) के समक्ष विचाराधीन है। 9 मार्च 2026 को हुई सुलह बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी और आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति बनी थी।
ऐसे में UFBU ने Indian Banks’ Association और DFS पर आरोप लगाया है कि वे सुलह प्रक्रिया लंबित रहने के बावजूद एकतरफा कदम उठा रहे हैं, जो औद्योगिक शांति के खिलाफ है।
कानूनी पहलू भी उठे
यूनियन ने कहा है कि यह कार्रवाई औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 33 के तहत भी सवाल खड़े करती है, क्योंकि किसी लंबित विवाद के दौरान सेवा शर्तों में बदलाव करना नियमों के विरुद्ध माना जाता है।
UFBU की मांगें
UFBU ने सरकार और बैंक प्रबंधन से मांग की है कि सभी एकतरफा निर्णय तुरंत वापस लिए जाएं। सुलह प्रक्रिया का सम्मान किया जाए। संवाद के जरिए न्यायसंगत समाधान निकाला जाए। साथ ही मुख्य श्रम आयुक्त से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की गई है।
आगे क्या?
UFBU ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो बैंकिंग क्षेत्र में औद्योगिक अशांति बढ़ सकती है, जिसकी जिम्मेदारी उन संस्थाओं पर होगी जो एकतरफा फैसलों को आगे बढ़ा रही हैं। यह विवाद केवल वेतन या प्रोत्साहन का नहीं, बल्कि बैंकिंग सेक्टर में सामूहिक सौदेबाजी और कार्यबल की एकता की परीक्षा बनता जा रहा है।
