गया : बिहार के गया में आस्था और आधुनिक तकनीक के बीच टकराव की एक अनोखी तस्वीर सामने आई है। करोड़ों रुपये की लागत से बना रबर डैम, जिसका उद्देश्य श्रद्धालुओं को सालभर जल उपलब्ध कराना था, आज खुद सूखा और बदहाल नजर आ रहा है। नतीजतन, पिंडदान करने आए लोगों को पानी खरीदकर कर्मकांड पूरा करना पड़ रहा है।

पौराणिक मान्यता और फल्गु का सूखा स्वरूप:दरअसल, फल्गु नदी साल भर सूखी रहती है और इसके पीछे एक पौराणिक मान्यता है। माता सीता ने नदी को ‘अंत: सलिला’ होने का श्राप दिया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जब 12 वर्षों के वनवास पर थे, तब अयोध्या में राजा दशरथ का निधन हो गया था। जब भगवान राम को इसकी जानकारी मिली, तो वे अपने पिता का पिंडदान करने के लिए फल्गु नदी के किनारे पहुंचे थे।

पिंडदान के लिए हुई आकाशवाणी

भगवान राम, माता सीता को फल्गु नदी किनारे रुकने के लिए कहकर भाई लक्ष्मण के साथ पिंडदान की सामग्री लाने चले गए थे। मां सीता फल्गु नदी के तट पर अकेली थीं, तभी आकाशवाणी हुई कि पिंडदान किया जाए। इस पर मां सीता ने कहा कि श्रीराम और लक्ष्मण सामग्री लाने गए हैं। इसके उत्तर में फिर से आकाशवाणी हुई कि मुहूर्त निकला जा रहा है, अतः तुरंत पिंडदान किया जाए।

आकाशवाणी सुनने के बाद माता सीता ने बालू का पिंड बनाकर राजा दशरथ का पिंडदान कर दिया। जब भगवान राम और लक्ष्मण लौटे और पिंडदान करने की बात कही, तो सीता जी ने बताया कि उन्होंने पिंडदान संपन्न कर दिया है। इस पर भगवान साक्ष्य मांगा, तो सीता ने वटवृक्ष, गाय, कौआ, फल्गु नदी और ब्राह्मण को अपना साक्षी बताया। भगवान ने इन पांचों से पूछा, तो वटवृक्ष को छोड़कर शेष चारों ने झूठ बोला कि सीता ने पिंडदान नहीं किया है।

मां सीता का भीषण श्राप

साक्ष्यों का झूठ सुनकर माता सीता अत्यंत क्रोधित हो गईं और उन्होंने गाय, कौआ, फल्गु नदी और ब्राह्मण को श्राप दे दिया। फल्गु नदी को श्राप मिला कि वह हमेशा ‘अंत:सलिला’ रहेगी, यानी ऊपर से सूखी दिखेगी और जमीन के नीचे से उसकी धारा बहेगी। पानी होने के बावजूद वह सूखी ही कहलाएगी। गाय को श्राप मिला कि पूजनीय होने के बावजूद हमेशा जूठन खाएगी। कौआ कभी अकेले नहीं खा पाएगा और उसकी आकस्मिक मृत्यु होगी। कितना भी धन मिल जाए, ब्राह्मण की दरिद्रता दूर नहीं होगी।

‘श्राप’ के आगे फीकी पड़ी आधुनिक व्यवस्था

फल्गु नदी को लेकर पौराणिक मान्यता है कि माता सीता के श्राप के कारण यह नदी ऊपर से सूखी रहती है और इसकी धारा जमीन के नीचे बहती है। बारिश के मौसम में इसमें पानी आता जरूर है, लेकिन दो से तीन महीनों में ही सूख जाता है।

इसी समस्या के समाधान के लिए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आधुनिक तकनीक का सहारा लेते हुए ‘गयाजी रबर डैम’ का निर्माण कराया। करीब 334 करोड़ रुपये की लागत से बने इस डैम का उद्देश्य था वर्षा जल को संचित कर श्रद्धालुओं को सालभर पिंडदान के लिए पानी उपलब्ध कराना।

हालांकि, मौजूदा हालात को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह तकनीकी प्रयास पौराणिक मान्यता के सामने बेअसर साबित हो रहा है। डैम या तो सूखा पड़ा है या उसमें जमा पानी उपयोग के योग्य नहीं बचता।

लापरवाही, प्रदूषण और पानी का संकट

डैम में बारिश का पानी रुकने के बावजूद, फूल-पत्तियों और पूजा सामग्री के जमा होने से कुछ ही महीनों में पानी गंदा और बदबूदार हो जाता है। यह स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि पानी आचमन के योग्य भी नहीं रहता और इससे चर्म रोग जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

गंदगी बढ़ने पर प्रशासन को मजबूरी में डैम का पानी छोड़ना पड़ता है। हाल ही में 3 अप्रैल को पानी डाउनस्ट्रीम में छोड़ दिया गया, जिसके बाद डैम पूरी तरह सूख गया।

अब स्थिति यह है कि पिंडदान करने आए श्रद्धालुओं को पानी खरीदना पड़ रहा है या चापाकल का सहारा लेना पड़ रहा है। त्रिपुरा और असम से आए श्रद्धालुओं का कहना है कि न तो डैम में स्वच्छ पानी उपलब्ध है और न ही नदी में गड्ढा खोदने पर पानी निकल रहा है।

स्थानीय पंडाओं के अनुसार, रुका हुआ पानी जल्दी दूषित हो जाता है और नदी की तलहटी में जमी मोटी मिट्टी की परत ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। उनका मानना है कि यदि जल का निरंतर प्रवाह बना रहता, तो स्थिति बेहतर हो सकती थी।

करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद, इस परियोजना से अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसका असर न केवल श्रद्धालुओं की सुविधा पर पड़ रहा है, बल्कि गया की धार्मिक छवि भी प्रभावित हो रही है। प्रशासन द्वारा समय पर सफाई न कर पाने से समस्या और बढ़ती जा रही है, जिससे आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।