केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अगर 1932 में डॉ. बी.आर. आंबेडकर की अलग निर्वाचक मंडल की मांग मान ली जाती, तो आज अनुसूचित जाति और जनजाति की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति अलग होती।

पटना: केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के संस्थापक जीतन राम मांझी ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए अलग निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) की मांग उठाई है। पार्टी की राज्य परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि 1932 के पूना पैक्ट के कारण डॉ. भीमराव आंबेडकर की मूल मांग लागू नहीं हो सकी, जिसका असर आज भी दलित समाज की राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक स्थिति पर दिखाई देता है।

मांझी ने कहा कि यदि उस समय अलग निर्वाचक मंडल की व्यवस्था लागू होती, तो अनुसूचित जाति और जनजाति के प्रतिनिधि केवल उन्हीं समुदायों के मतदाताओं द्वारा चुने जाते। उनके अनुसार इससे इन वर्गों को अधिक प्रभावी और स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलता। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में सीटें भले ही आरक्षित हों, लेकिन मतदान सभी वर्गों के लोग करते हैं। ऐसे में प्रभावशाली समुदायों का असर निर्वाचित प्रतिनिधियों पर बना रहता है और दलित समाज के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया कि आजादी के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अनुसूचित जातियों की साक्षरता दर और सामाजिक-आर्थिक स्थिति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। उन्होंने कहा कि अगर डॉ. आंबेडकर की अलग निर्वाचक मंडल की मांग स्वीकार कर ली गई होती, तो आज हालात काफी अलग होते।

मांझी ने पूना पैक्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर के बीच अलग निर्वाचक मंडल को लेकर वैचारिक मतभेद थे। अंततः समझौते के तहत अलग निर्वाचक मंडल की बजाय आरक्षित सीटों पर सभी मतदाताओं को मतदान का अधिकार देने की व्यवस्था स्वीकार की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उस दौर के राजनीतिक दबाव के कारण डॉ. आंबेडकर को अपनी मूल मांग से पीछे हटना पड़ा। मांझी ने कहा कि आंबेडकर ने इस समझौते को मजबूरी में स्वीकार किया था और इसका असर आज भी दलित समाज महसूस कर रहा है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति को वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण देने के लिए अलग निर्वाचक मंडल जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।