रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ितों को बेहतर न्याय, सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार को कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में बलात्कार से जन्मे बच्चों के लिए कक्षा 12 तक मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करने तथा विवादास्पद और अमानवीय ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है।
यह फैसला 24 सितंबर 2025 को स्वतः संज्ञान से शुरू हुई जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान सुनाया गया। अदालत ने कहा कि यौन उत्पीड़न की पीड़िताओं को केवल अपराध का ही नहीं, बल्कि सामाजिक उपहास, बहिष्कार और मानसिक प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ता है। कई मामलों में परिवारों को पड़ोसियों के शत्रुतापूर्ण रवैये के कारण अपना घर तक छोड़ना पड़ता है।
‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर सख्त रोक
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में तत्काल प्रभाव से ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश का उल्लंघन पेशेवर कदाचार माना जाएगा और दोषी कर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस और जांच व्यवस्था में सुधार
अदालत ने निर्देश दिया कि यौन अपराधों की पीड़िताओं का बयान यथासंभव महिला अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाए। साथ ही पुलिस कर्मियों के लिए नियमित संवेदनशीलता प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
झारखंड के पुलिस महानिदेशक (DGP) को बीएनएसएस, 2023 की धारा 173 के तहत ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज करने और उसके त्वरित हस्तांतरण की व्यवस्था सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है। नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
जांच और मुकदमे के लिए तय हुई समयसीमा
अदालत ने मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए सख्त समयसीमा निर्धारित की है:
* घटना के 15 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच पूरी हो।
* एफआईआर दर्ज होने के दो महीने के भीतर अंतिम जांच पूरी की जाए।
* पीड़ितों को तुरंत कानूनी, चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
* नाबालिग पीड़ितों को POCSO कानून के तहत 24 घंटे के भीतर चिकित्सा सहायता, सुरक्षा और आश्रय उपलब्ध कराया जाए।
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बलात्कार से जन्मे बच्चों के लिए शिक्षा की गारंटी है। अदालत ने राज्य सरकार को जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया है, जो ऐसे बच्चों को कक्षा 12 तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दिलाने की जिम्मेदारी निभाएंगे।
इसके अलावा, यदि ऐसे बच्चे IIT, NIT, AIIMS या IIM जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए चयनित होते हैं, तो उन्हें राज्य सरकार की ओर से छात्रवृत्ति उपलब्ध कराई जाएगी।
आत्मरक्षा प्रशिक्षण को बढ़ावा
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की ‘रानी लक्ष्मीबाई आत्म रक्षा प्रशिक्षण (रक्षा)’ योजना का भी उल्लेख किया। इस योजना के तहत सरकारी स्कूलों और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को तीन महीने का आत्मरक्षा प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिए प्रति विद्यालय मासिक सहायता राशि 3,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये कर दी गई है।
वन-स्टॉप सेंटर और आश्रय गृहों की निगरानी
अदालत ने महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग को वन-स्टॉप सेंटरों की खामियों को दूर करने और उनकी निगरानी के लिए महिला नेतृत्व वाली समिति गठित करने का निर्देश दिया है। साथ ही आश्रय गृहों और पुनर्वास केंद्रों की जानकारी व्यापक स्तर पर प्रचारित करने के आदेश भी दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि यौन अपराध पीड़िताओं के प्रति संवेदनशीलता, सम्मान और त्वरित सहायता सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। अदालत के ये निर्देश न केवल न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करेंगे, बल्कि पीड़िताओं और उनके बच्चों के पुनर्वास एवं सम्मानजनक जीवन की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित होंगे
