साहित्य सम्मेलन में 15 दिवसीय ‘पुस्तक चौदस मेला’ के साथ हुआ ‘हिन्दी पखवारा’ का उद्घाटन, महान हिन्दी-सेवी फादर कामिल बुल्के एवं राष्ट्रभाषा-प्रहरी नृपेंद्र नाथ गुप्त की मनायी गयी जयंती।

पटना: प्रत्येक व्यक्ति को, चाहे वह विद्यार्थी हो, शिक्षक हो अथवा और कुछ भी, सभी साक्षरों को पुस्तकों से जुड़ना चाहिए। पुस्तकें ही सबकी सच्ची और अच्छी संगिनी और मार्ग-दर्शिका होती हैं। यह केवल ज्ञान ही नहीं प्रदान करती, बल्कि दुखी मन का रंजन भी करती है और थके हुओं को नया उत्साह और नयी ऊर्जा भी प्रदान करती है।
यह बातें मंगलवार को, कदमकुआँ स्थित बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आरंभ हुए, ‘हिन्दी पखवारा एवं पुस्तक चौदस मेला’ का उद्घाटन करते हुए, सिक्किम के पूर्व राज्यपाल गंगा प्रसाद ने कही। उन्होंने कहा कि संपूर्ण भारतवर्ष अब यह समझ चुका है कि देश के लिए हिन्दी बहुत आवश्यक है। दक्षिण और पूर्वोत्तर में भी अब संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी का उपयोग किया जा रहा है। राष्ट्रभाषा के संबंध में आरंभ में ही भूल हो गयी। यदि हिन्दी ‘राष्ट्रभाषा’ घोषित कर दी गयी होती, तो आज हमें इस विषय पर चर्चा करने की आवश्यकता नहीं होती। हिन्दी एक भाषा ही नहीं, भारत की अभिमान है।

समारोह के मुख्यअतिथि और राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग, बिहार के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा कि यह शुभ संकेत है कि अब पुस्तकों के प्रति पाठकों का रुझान बढ़ा है। हिन्दी के प्रति भी सम्मान का भाव बढ़ा है। पुस्तक और पुस्तकालय से जुड़ कर ही हम अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं। साहित्य सम्मेलन हिन्दी के विकास और हिन्दी के प्रति आमजन की रूचि बढ़ाने हेतु निरन्तर कार्य करता रहा है। यह आयोजन भी उसी कड़ी में है।
सभा की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि, जिस कारण से हम हिन्दी-दिवस मनाते हैं, वह तो आज भी छलाबा है। हिन्दी को ‘भारत की राजभाषा’ घोषित कर भी ‘राज-भाषा’ का स्थान नहीं दिया गया। अब तो भारत के लोग हिन्दी को ‘राष्ट्रभाषा’के रूप में ही देखना चाहते हैं। इससे कम में भारत के डेढ़ अरब की आबादी कुछ भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने पुस्तक चौदस मेले से पुस्तकों के क्रय का आग्रह करते हुए कहा कि यह मेला सम्मेलन द्वारा इस भाव और आकांक्षा से लगाया जाता है कि यहाँ से क्रय कर घर ले जायी गयी पुस्तकें, उसी प्रकार ज्ञान की वृद्धि करती हैं, जिस प्रकार ‘धन-त्रयोदशी’ को ख़रीदी गयी संपत्ति से घर में लक्ष्मी की वृद्धि होती है।

हिन्दी के महान ध्वज-वाहक फादर कामिल बुल्के और राष्ट्रभाषा-प्रहरी नृपेंद्रनाथ गुप्त को स्मरण करते हुए, डा सुलभ ने कहा कि इन जैसे हिन्दी के घोर पक्षधरों के कारण यह भाषा, अवरोधों के बाद भी निरन्तर आगे बढ़ती रही। एक विदेशी नागरिक और ईसाई पुरोहित होकर भी डा बुल्के ने संस्कृत और हिन्दी के लिए जो अवदान दिए, वे स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है।
आरम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए, हिन्दी-पखवारा और पुस्तक मेला के स्वागताध्यक्ष डा कुमार अरुणोदय ने कहा जबतक हामारे बच्चे ‘ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार’ पढ़ते रहेंगे, हिन्दी के समक्ष बाधाएँ आती रहेंगी। हमें अपनी भाषा और पुस्तकों के प्रति जागरूक और गम्भीर होना चाहिए।
सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा उपेन्द्रनाथ पाण्डेय, डा शंकर प्रसाद, डा जनार्दन सिंह, ध्रुव नारायण प्रसाद, डा पूनम आनन्द, आराधना प्रसाद आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कुमार अनुपम ने किया।

भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश प्राप्त अधिकारी और कवि बच्चा ठाकुर, डा रत्नेश्वर सिंह, डा सुधा सिन्हा, कुमार अनुपम, प्रो उषा सिंह, डा पुष्पा जमुआर, नमिता लोहानी, डा पूनम देवा, विभा रानी श्रीवास्तव, डा नागेश्वर प्रसाद यादव, ई अशोक कुमार, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, जय प्रकाश पुजारी, ई आनन्द किशोर मिश्र, डा मनोज गोवर्द्धनपुरी, प्रेमलता सिंह, चौधरी, पं उमेश मिश्र, शमा कौसर ‘शमा’, डा सुषमा कुमारी, पं गणेश झा, डा नीतू सिंह, डा विद्या चंदा मिश्र, चितरंजन भारती, जय प्रकाश पुजारी, सदानन्द प्रसाद, प्रो सावित्री कुमारी, बाँके बिहारी साव, इन्दु भूषण सहाय, अभय सिन्हा, रंजन कुमार मिश्र, महफ़ूज़ आलम, ग़ुलाम मुस्तफ़ा, ईशा कुमारी, नन्दन कुमार, रंजन कुमार अमृतनिधि आदि साहित्यकारों एवं पुस्तक प्रेमियों ने पुस्तकें क्रय कर पाठकों को प्रेरित किया।
पुस्तक-मेला में, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रकाशन विभाग एवं स्थानीय अन्य स्थानीय प्रकाशकों ने पुस्तकें सजायी हैं। 10 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत की छूट पर पुस्तकें मिल रही हैं।
