पटना : हसरत, अरमान और लंबे इंतजार के बाद आखिरकार भारतीय जनता पार्टी ने बिहार में अपना सबसे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य हासिल कर लिया है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही राज्य में पहली बार बीजेपी का अपना सीएम बना है। यह सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि दशकों की संगठनात्मक मेहनत और राजनीतिक रणनीति की जीत है। बिहार में बीजेपी को मजबूत करने वाले सारे नामों को याद किया जाता रहा, लेकिन लोगों ने कैलाशपति मिश्र और सुशील मोदी को सबसे ज्यादा याद किया। बीजेपी ने अपने विधायकों की संख्या कैसे बढ़ाई, आइए जानते हैं कैसे-किसकी बदौलत आज यह दिन सामने आया है।

कैलाशपति मिश्र: संगठन के भीष्म पितामह

बिहार बीजेपी को खड़ा करने का श्रेय काफी हद तक कैलाशपति मिश्र को जाता है। कैलाशपति मिश्र बीजेपी के गठन से पहले विधायक बन चुके थे। बीजेपी का गठन हुआ तो बिहार के पहले प्रदेश अध्यक्ष बने। उन्होंने पार्टी को न सिर्फ संगठित किया, बल्कि उसे एक पहचान भी दी। उनकी प्रतिबद्धता और नेतृत्व के कारण ही उन्हें “बीजेपी का भीष्म पितामह” कहा जाता है। कैलाशपति मिश्र ने जो पार्टी को सींचा था, उसका पुरस्कार उन्हें बीजेपी ने राजस्थान एवं गुजरात के राज्यपाल बनाकर दिया।

संघर्ष से शिखर तक का सफर

बिहार में बीजेपी की जड़ें जनसंघ के दौर से जुड़ी हैं, लेकिन 1980 में पार्टी गठन के बाद असली परीक्षा शुरू हुई। उस समय कांग्रेस का दबदबा इतना मजबूत था कि बीजेपी के लिए जगह बनाना बेहद कठिन था। 1980 में बीजेपी ने तत्कालीन बिहार की 246 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे और 21 सीटें जीती थीं। 1985 में बीजेपी ने 234 प्रत्याशी दिए तो जीत की संख्या 16 पर आ गई। इन दोनों चुनाव में बीजेपी के क्रमश: 173 और 172 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। समझा जा सकता है कि तब बीजेपी के लिए बिहार कितनी मुश्किल जमीन थी। लेकिन, 1990 से मेहनत का नतीजा सामने आने लगा। कांग्रेस की पकड़ ढीली होती गई और बीजेपी की साख बढ़ती गई। 1990 में 237 सीटों पर प्रत्याशी देकर बीजेपी ने 39 विधायकों से संतोष किया, जबकि लालू प्रसाद यादव के उभरने के दौर 1995 में 315 सीटों पर प्रत्याशी देकर 41 सीटें जीतने का अवसर हासिल किया।

2000 में बीजेपी ने 168 सीटों पर चुनाव लड़ा और 67 सीटें जीतीं। फरवरी 2005 में 103 सीटों पर उम्मीदवार उतारे 37 सीटें जीतीं। अक्टूबर 2005 में 102 सीटों पर चुनाव लड़ा और 55 पर जीत हासिल किया। 2010 में 102 सीटों पर चुनाव लड़े और शानदार 91 जीते। 2015 में जदयू से अलग होकर 157 सीटों पर चुनाव लड़े और 53 जीते। 2020 में 110 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 74 जीते। 2025 में 89 सीटों पर जीत हासिल किया।

सुशील मोदी: रणनीति और संघर्ष के अर्जुन

1990 के दशक में जब बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का उदय हुआ, उसी समय सुशील कुमार मोदी बीजेपी के मजबूत चेहरे के रूप में उभरे। उन्होंने न केवल पार्टी को विस्तार दिया, बल्कि गठबंधन राजनीति में भी अहम भूमिका निभाई। नीतीश कुमार के साथ उनकी साझेदारी ने बीजेपी को सत्ता के करीब पहुंचाया।

गठबंधन, उतार-चढ़ाव और वापसी

2005 से 2010 के बीच बीजेपी-जदयू गठबंधन ने बड़ी सफलता हासिल की। हालांकि 2013 में अलगाव और 2015 में हार ने पार्टी को झटका दिया, लेकिन सुशील मोदी की रणनीति और लगातार प्रयासों से 2017 में फिर से एनडीए की सरकार बनी।

सम्राट चौधरी का उभार

2018 में बीजेपी में शामिल हुए सम्राट चौधरी ने तेजी से अपनी पहचान बनाई। 2022 के बाद उनका कद लगातार बढ़ता गया और 2024 में उप मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने खुद को एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया। 2025 के चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत के बाद पार्टी ने उन पर भरोसा कायम रखा।

इतिहास का नया अध्याय

आज सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ एक राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि उन सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं के संघर्ष का परिणाम है जिन्होंने बिहार में बीजेपी को खड़ा करने के लिए वर्षों तक मेहनत की। यह क्षण कैलाशपति मिश्र और सुशील मोदी जैसे नेताओं की विरासत को भी सम्मान देता है। बिहार की राजनीति में यह बदलाव एक नए युग की शुरुआत का संकेत है, जहां बीजेपी अब सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता की भूमिका में है।