पटना: बिहार विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक कोटे की 8 सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियां तेज हो गई हैं। कई दलों ने अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं, जबकि कुछ सीटों पर संभावित उम्मीदवारों के नाम लगभग तय माने जा रहे हैं। उम्मीदवारों के सामाजिक समीकरण पर नजर डालें तो अब तक सामने आए चेहरों में सवर्ण समुदाय की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे रही है।

छह प्रमुख दल – BJP, JDU, RJD, जन सुराज और CPI समेत अन्य दल – इन चुनावों को लेकर सक्रिय हैं। घोषित और संभावित उम्मीदवारों को मिलाकर करीब 24 चेहरे चर्चा में हैं। इनमें लगभग 14 उम्मीदवार सवर्ण समुदाय से बताए जा रहे हैं। इसके अलावा OBC, EBC और अन्य सामाजिक समूहों से आने वाले उम्मीदवार भी मैदान में हैं।

जन सुराज ने 8 सीटों पर उतारे उम्मीदवार

जन सुराज ने सभी 8 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। पार्टी के उम्मीदवारों में 5 सवर्ण समुदाय से हैं, जिनमें 4 भूमिहार और एक राजपूत शामिल हैं। इसके अलावा दो यादव और एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा गया है। जन सुराज पहली बार आधिकारिक तौर पर विधान परिषद चुनाव में उतर रहा है। पार्टी ने किसी EBC उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है।

तिरहुत स्नातक सीट पर उम्मीदवार को लेकर भी पार्टी को बदलाव करना पड़ा। पहले भूषण झा को उम्मीदवार बनाया गया था और प्रशांत किशोर ने उनके साथ प्रचार भी किया था। बाद में भूषण झा के पार्टी से अलग होने के बाद श्याम नंदन यादव को उम्मीदवार बनाया गया।

RJD के उम्मीदवारों में सवर्ण, यादव और कुर्मी का समीकरण

RJD ने अब तक 6 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए हैं। इनमें तीन सवर्ण समुदाय से हैं – दो भूमिहार और एक ब्राह्मण। इसके अलावा दो यादव और एक कुर्मी उम्मीदवार को मैदान में उतारा गया है। पार्टी के उम्मीदवारों के सामाजिक समीकरण में अगड़ा और पिछड़ा वर्ग दोनों को प्रतिनिधित्व मिलता दिखाई दे रहा है। शिक्षक और स्नातक कोटे की अलग-अलग सीटों पर सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। दो सीटें गठबंधन के सहयोगी दलों के लिए छोड़े जाने की चर्चा है।

JDU के 4 उम्मीदवारों में तीन सवर्ण

NDA में सीट बंटवारे के तहत JDU चार सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी ने 23 सितंबर को चारों सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। पटना स्नातक सीट से JDU ने मौजूदा MLC नीरज कुमार को लगातार चौथी बार उम्मीदवार बनाया है।

JDU के चार उम्मीदवारों में तीन सवर्ण समुदाय से हैं, जिनमें दो ब्राह्मण और एक भूमिहार हैं। वहीं एक उम्मीदवार अमात यानी EBC समुदाय से हैं। इस लिहाज से JDU के उम्मीदवारों में सवर्णों की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत है।

BJP के संभावित उम्मीदवारों में यादव और राजपूत चेहरे

JDU के उम्मीदवारों की घोषणा के बाद यह लगभग स्पष्ट माना जा रहा है कि BJP चार सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। हालांकि पार्टी ने अभी आधिकारिक तौर पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। संभावित उम्मीदवारों को चुनाव की तैयारी करने के लिए कहा गया है।

पटना शिक्षक सीट से नवल किशोर यादव और कोसी स्नातक सीट से एनके यादव के नाम चर्चा में हैं। दोनों अपनी-अपनी सीट से मौजूदा विजेता बताए जा रहे हैं। BJP के संभावित उम्मीदवारों में दो यादव और एक राजपूत चेहरा शामिल हैं। इससे पार्टी के उम्मीदवार चयन में एक अलग सामाजिक समीकरण दिखाई देता है।

कांग्रेस और CPI के संभावित उम्मीदवार

कांग्रेस की ओर से दरभंगा शिक्षक सीट पर मौजूदा MLC डॉ. मदन मोहन झा का नाम प्रमुखता से चर्चा में है। कांग्रेस कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी, इसे लेकर प्रदेश नेतृत्व की ओर से अभी अंतिम तस्वीर स्पष्ट नहीं की गई है।

वहीं CPI के मौजूदा तिरहुत शिक्षक MLC प्रो. संजय कुमार सिंह भी चुनाव मैदान में हैं। वे भूमिहार समुदाय से आते हैं।

क्यों सवर्ण उम्मीदवारों पर ज्यादा भरोसा?

1. स्नातक मतदाताओं में सवर्णों की हिस्सेदारी

स्नातक और शिक्षक कोटे के चुनाव सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग होते हैं। इन सीटों पर मतदान के लिए संबंधित मतदाता का स्नातक या शिक्षक होना और निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत होना जरूरी है। बिहार जातीय एवं आर्थिक सर्वेक्षण 2023 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य की कुल आबादी करीब 13.25 करोड़ है। इसमें लगभग 6.11 प्रतिशत लोग स्नातक हैं।

सर्वेक्षण के अनुसार, सामान्य वर्ग में स्नातक लोगों का अनुपात 13.41 प्रतिशत है। वहीं पिछड़ा वर्ग में यह 6.77 प्रतिशत और अति पिछड़ा वर्ग में 4.27 प्रतिशत बताया गया है। राज्य में करीब 3.92 लाख लोग इंजीनियरिंग और लगभग 74 हजार लोग मेडिकल स्ट्रीम से स्नातक बताए गए हैं।

2. MLC चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ अहम

स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का क्षेत्रफल विधानसभा सीटों की तुलना में काफी बड़ा होता है। एक सीट का दायरा कई जिलों तक फैला हो सकता है। इसके बावजूद मतदाताओं की संख्या आम विधानसभा चुनाव की तुलना में सीमित रहती है।

ऐसे चुनावों में उम्मीदवार का व्यक्तिगत जनसंपर्क, मतदाताओं के बीच पहचान और क्षेत्र में वर्षों से बनी पकड़ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विधानसभा चुनाव की तरह बड़े पैमाने पर बूथ स्तर का पार्टी संगठन यहां हमेशा उसी रूप में काम नहीं करता।खासकर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में शिक्षक संगठनों से जुड़ाव, शिक्षकों के बीच सक्रियता, स्कूल-कॉलेज स्तर का नेटवर्क, स्थानीय शिक्षक नेताओं का समर्थन और चुनावी अनुभव जैसे पहलू उम्मीदवार के अभियान को प्रभावित कर सकते हैं। इस वजह से MLC चुनाव में राजनीतिक दलों के लिए केवल पार्टी का नाम ही नहीं, बल्कि उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान, क्षेत्रीय संपर्क और मतदाताओं तक सीधी पहुंच भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।